15 अगस्त सिर्फ़ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है…
यह हर साल लौटकर आने वाला वह रिमाइंडर है,
जो हमें चुपचाप याद दिलाता है—
कि हम आज़ाद हैं।
आज हम अपनी बात कह सकते हैं,
अपने सपने देख सकते हैं,
अपनी पसंद का रास्ता चुन सकते हैं,
सवाल कर सकते हैं,
गलत के सामने खड़े हो सकते हैं…
क्योंकि कोई हमारे सिर पर बैठकर
यह तय करने वाला नहीं कि हमें कैसे जीना है।
हम किसी से छोटे नहीं,
कोई हमसे बड़ा नहीं।
न कोई मालिक, न कोई गुलाम—
हम सब बराबर हैं।
लेकिन कभी सोचिए…
जिस आज़ादी को हम आज
इतनी आसानी से जी रहे हैं,
उसे पाने के लिए किसी ने
अपनी माँ की गोद छोड़ी थी…
किसी ने पिता का सहारा छोड़ा था…
किसी ने अपने बच्चों का भविष्य छोड़ा था…
और किसी ने यह जानते हुए भी कदम बढ़ाया था
कि शायद वह अपना अगला सूरज देख ही न पाए।
उनकी आँखों में शायद
एक ही सपना रहा होगा—
“हम नहीं तो कोई बात नहीं…
बस हमारी आने वाली पीढ़ियाँ आज़ाद रहें।”
और आज…
जब हम उसी आज़ादी की हवा में साँस लेते हैं,
तो 15 अगस्त हमसे बस इतना पूछता है—
“जिस आज़ादी के लिए हमने अपना आज दे दिया था,
क्या तुमने उसकी कीमत समझी?”
इसलिए इस 15 अगस्त
सिर्फ़ तिरंगा मत देखना…
उसमें उन आँखों को भी देखना
जिन्होंने आज़ाद भारत का सपना देखा था,
मगर उसे अपनी आँखों से देख नहीं पाए।
क्योंकि 15 अगस्त जश्न नहीं सिर्फ़…
यह उन कुर्बानियों का रिमाइंडर है,
जिनकी वजह से आज
हम अपने फैसलों के मालिक हैं।
🇮🇳 आजादी मिली नहीं थी…
किसी ने अपनी पूरी ज़िंदगी देकर हमें सौंपी थी। 🇮🇳
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